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सोच-सोच का फर्क | Difference of Thinking

सोच-सोच का फर्क- Hindi Story

दोपहर का समय था, एक साधु अपने कुछ शिष्यों के साथ नदी के किनारे बैठे हुए उपदेश दे रहे थे, तभी उनके पास एक राहगीर आया | उसने साधू को प्रणाम किया और बोला, महात्मन मैं इस स्थान पर नया हूँ और निवास की इच्छा से यहाँ आया हूँ, परन्तु यहाँ निवास करने से पहले मैं यहाँ के निवासियों के बारे में जानना चाहता हूँ, कृपया करके मेरा मार्गदर्शन करें।

साधु ने बड़े प्रेम से उस व्यक्ति की ओर देखा और पूछा  ” बच्चा जहाँ से तुम आये हो वहां के निवासी कैसे हैं ? ”
इस पर व्यक्ति ने जवाब दिया की वहां के लोग तो बहुत ही दुष्ट , व्यभिचारी और नीच प्रवृति के हैं , उनसे किसी भी प्रकार के सहयोग की आशा रखा व्यर्थ है .
इस पर महात्मा ने कहा कि  “इस स्थान पर भी कुछ इसी तरह के लोग रहते हैं “, इतना सुनकर राहगीर वहां से चला गया| थोड़ी देर बाद वहां से एक दूसरा राहगीर गुजरा उसने भी महात्मा से वही प्रश्न किया और महात्मा ने भी अपना वही सवाल दोहराया , राहगीर ने साधु को कहा कि हे महात्मा जहाँ मैं रहता हूँ वहां के निवासी बड़े ही भले, सभ्य और सहयोगी हैं , परन्तु व्यवसाय के कारण मुझे वहां से जाना पड़ रहा है, इसके लिए मुझे बहुत दुःख है | ये बात सुनकर साधु ने व्यक्ति को कहा कि “जिस स्थान की तलाश तुम कर रहे हो ये स्थान उसी जगह की तरह है, यहाँ के लोग बहुत भले हैं, तुम यहाँ सुख पूर्वक रह सकते हो, व्यक्ति प्रसन्नता पूर्वक साधु को नमन करके वही से लौट गया।

सभी शिष्य इस घटना को देख कर समझ नहीं पा रहे थे, कि गुरूजी ने दो लोगों को दो विपरीत बातें क्यों कही. एक शिष्य ने आखिर गुरूजी से पूछा की आपने दोनों को अलग-अलग बात क्यों कही, तब महात्मा ने कहा कि “इन दोनों व्यक्तियों के नजरिये पूर्णतया विपरीत हैं और दोनो अपने अपने ढंग से अपने आस पड़ोस को देखते हैं, एक को सर्वथा बुराई नजर आती है तो दूसरे को अच्छाई” इसलिए मैंने दोनों को दो अलग बात कही.

By: Hindi Manthan ( हिंदी मंथन )

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