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चिपको आंदोलन :- एक संघर्ष वृक्षों के लिए

photo by Nehal Jain, licence: creative commons(CC BY-SA 4.0) source:https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Chipko_Movement.png

“चिपको आंदोलन” इस आंदोलन के महत्व को वास्तव में,वो लोग ही बेहतर तरीके से समझ सकते हैं “जो अपने पर्यावरण और प्रकृति से लगाव रखते हैं”। चिपको आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के निवासियों एवं महिलाओं द्वारा वर्ष 1973 में टिहरी गढ़वाल जनदपद में हुई |

‘चिपको आन्दोलन’ घोषवाक्य –

“क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।

मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।”

 

इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने काफी संघर्ष किया, यहाँ तक कि उन्होंने अपनी जान का जोखिम भी उठाना स्वीकार कर लिया । जाने माने पर्यावरणविद “सुंदरलाल बहुगुणा”इस आंदोलन के प्रेरणा रहे |

चिपको आंदोलन में वृक्षों के लिए जिस तरह का समर्पण देखने को मिला उससे इस आंदोलन को अंतराष्ट्रीय स्तर पर बहुत ख्याति मिली | स्टॉकहोल्म में आयोजित सम्मलेन में लिखा गया ” हिमालय की पहाड़ियों की ढलानों पर अत्यंत प्रभावशाली आंदोलन प्रारम्भ हुआ जिसमे ग्रामीणों ने वन्य उद्योगों द्वारा हो रहे विनाश को रोकने के लिए एक प्रभावशाली अहिंसात्मक रास्ता अपनाया | जब पेड़ों को काटने वाले आते तो वो पेड़ों के इर्द गिर्द गोला बना लेते और चिपक जाते ” | वैसे तो यह बात जितनी पढ़ने और समझने में आसान लगती है, पर उतनी है नहीं, पर्यावरण के लिए अपना समर्पणऔर योगदान देना भी कोई सरल कार्य नहीं है | समय -समय पर लोगों ने अपने अपने तरीके से इस बात को समझाने का प्रयास किया है कि “पेड़ों का मानव जीवन में अमूल्य योगदान है” | इस आंदोलन का उद्देश्य सिर्फ वृक्षों के कटाव और सुरक्षा से ही नहीं था बल्कि ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगा कर अपनी जरूरतों को पूरा करने से भी था जिससे कि हमारे पर्यावरण का संतुलन कायम रह सके और हमारी जरूरतें जैसे भोजन, ईंधन , रेशे, उर्वरक और चारा भी पूरा हो सके.| चिपको आंदोलन में महिलाओं में “गौरा देवी ” ने एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, उन्होंने बड़े व्यापक स्तर पर “महिला मंगलदल ” का नेतृत्व किया | महिलाओं में सुदेशा देवी और बचनी देवी की भी अग्रणी भमिका रही | महिलाओं के इस आंदोलन से जुड़ने पर इसे और शक्ति प्राप्त हुई और अंततः यह आंदोलन सफलतापूर्वक समाप्त हुआ |  कुमाँऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ.शेखर पाठक के अनुसार, “भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहाँ तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको आंदोलन की वजह से ही संभव हो पाया।”

वृक्ष मानव को बहुत कुछ देते हैं, तो उनकी सुरक्षा भी  मानव का ही उत्तरदायित्व है | पेड़ों के अंधाधुंध कटाव के कारण आज हमारे पर्यावरण को काफी क्षति हो चुकी है, जिससे निपटने का सिर्फ एक ही उपाय है कि “जहाँ तक संभव हो सके हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए साथ ही लोगों को और जागरूक बनाना चाहिए ” |

By: Hindi Manthan ( हिंदी मंथन )

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